मेरे स्वर में मुकेश : जीना इसी का नाम है : मुकेश -
राजकपूर - शैलेन्द्र : फिल्म अनाडी : गीत की शुरुआत -
राजकपूर मस्ती में सड़क पर चले जा रहे ,, कदम बढ़ाते जा रहे थे -- बस एक कदम और बढाया ही था कि देखा नीचे सड़क पर एक पतंगा -- बस पैर के नीचे आने ही वाला था --- उठे हुए पैर रुक जाते हैं और एक पत्ते पर उस पतंगे को बड़े सलीके से राजकपूर उठाते हैं -- और सड़क के किनारे खिले हुए फूलों के बीच उसे धीर से बिठा देते हैं ...बेफिक्र मस्ती में सड़क पर झूमते हुए चला जाने वाला अनाडी नौजवान भी अपने पैरों के नीचे आने वाले एक छोटे से पतंगे की जान की कीमत समझता है .... द्वितीय महायुद्ध से ध्वस्त रूस में राजकपूर इसीलिये लोकप्रिय थे क्योंकि उनकी फिल्मों ने रूसियों को बताया कि भयावह विभीषिका से गुजरने के बाद भी कैसे हसते हुए ज़िन्दगी बिताई जा सकती है ...... आज आप सभी मित्रों के लिए मुकेश जी का गाया हुआ -- किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार --- मेरे स्वर में ... कैसा लगा ........... ज़रूर कहिएगा ............
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